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Bastar Forest Nutrition: बस्तर के घने जंगल हैं आदिवासियों का प्राकृतिक 'फूड बैंक'; सरकारी राशन नहीं, वन उत्पादों से सजती है पोषण की थाली

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Bastar Forest Tribal Food Bank News: जब भी देश में खाद्य सुरक्षा (Food Security) और पोषण की बात होती है, तो अमूमन लोगों के जेहन में सरकारी उचित मूल्य की दुकानें (Ration Shops), अनाज से भरे बड़े-बड़े सरकारी गोदाम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की तस्वीरें सामने आती हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के बस्तर (Bastar) संभाग के सुदूर और घने वनांचलों में रहने वाले हजारों आदिवासी परिवारों की कहानी इससे बिल्कुल जुदा और अनूठी है। बस्तर के आदिवासियों के लिए सदियों से वहां का समृद्ध और अनमोल जंगल ही उनका सबसे बड़ा, सबसे सुरक्षित और सबसे भरोसेमंद 'फूड बैंक' (Natural Food Bank) बना हुआ है।

पीढ़ियों से पोषण और आजीविका का मुख्य आधार

बस्तर के आदिवासियों का जीवन, संस्कृति और खान-पान पूरी तरह से प्रकृति और वनों पर ही निर्भर है। आधुनिक चकाचौंध से दूर इन वनांचलों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए यह जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक ऐसा अक्षय पात्र है जो साल के बारहो महीने उनके लिए पौष्टिक और जैविक भोजन सुनिश्चित करता है:

प्राकृतिक और शुद्ध आहार: बस्तर के जंगलों से आदिवासियों को प्रचुर मात्रा में ऐसे फल, फूल, कंदमूल, हरी पत्तियां और मशरूम (जैसे बोड़ा) मिलते हैं, जो पोषक तत्वों, विटामिन्स और खनिजों से भरपूर होते हैं। इन वन उत्पादों में किसी भी तरह के रासायनिक खाद या कीटनाशकों का उपयोग नहीं होता, जिससे यह पूरी तरह शुद्ध और स्वास्थ्यवर्धक होते हैं।

परंपरागत ज्ञान: आदिवासी समाज के पास पीढ़ियों से चला आ रहा ऐसा अद्वितीय पारंपरिक ज्ञान है, जिसके जरिए वे जानते हैं कि किस मौसम में जंगल से कौन सा खाद्य पदार्थ चुनना है और उसे सेहत के लिए किस तरह तैयार करना है।

महुआ, इमली और चारटोरा से सजती है पोषण की थाली

बस्तर के जंगलों में मौसम के अनुसार मिलने वाले वनोपज (Forest Produce) न केवल आदिवासियों की थाली को पोषण से भरते हैं, बल्कि उनकी आर्थिक रीढ़ भी हैं:

ऋतु चक्र के अनुसार भोजन: गर्मी के दिनों में जहां इन्हें चार, महुआ, तेंदू और इमली जैसे वनोपज मिलते हैं, वहीं बारिश के मौसम में बस्तर का प्रसिद्ध और बेहद कीमती मशरूम 'बोड़ा' (Boda) और बांस के करील (बांस कोपल) इनकी थाली की मुख्य पहचान बनते हैं। इसके अलावा कई तरह की दुर्लभ जड़ी-बूटियां और कंदमूल इनके दैनिक आहार का हिस्सा होते हैं।

आर्थिक संबल: इन वन उत्पादों को स्थानीय हाट-बाजारों में बेचकर आदिवासी परिवार अपनी जरूरत की दूसरी चीजें खरीदते हैं। महुआ, टोरा, हर्र-बहेरा और कालमेघ जैसे लघु वनोपज इनकी आय का एक बड़ा जरिया हैं।

जल, जंगल और जमीन से अटूट रिश्ता: बस्तर का यह पारंपरिक मॉडल यह साबित करता है कि अगर वनों का सही तरीके से संरक्षण किया जाए, तो वे बिना किसी सरकारी मदद के भी एक पूरी आबादी की खाद्य सुरक्षा की गारंटी बन सकते हैं। यही वजह है कि आदिवासी समुदाय जंगलों को अपनी जान से ज्यादा प्यार करता है और उसकी पूजा करता है।

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