Yashodhara Story: बुद्ध पूर्णिमा का पर्व न केवल महात्मा गौतम बुद्ध के ज्ञान और निर्वाण का प्रतीक है, बल्कि यह उस महान त्याग को भी याद करने का दिन है, जो उनके पीछे छूट गया था। जब राजकुमार सिद्धार्थ अपनी सोती हुई पत्नी यशोधरा और दुधमुंहे पुत्र राहुल को आधी रात में छोड़कर सत्य की खोज में निकल गए, तो उसके बाद यशोधरा पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन यशोधरा ने हार मानने के बजाय एक ऐसा मार्ग चुना, जिसने उन्हें इतिहास में अमर कर दिया।
बिना बताए जाने का था मलाल, महलों में जिया वैराग्य का जीवन
यशोधरा को इस बात का गहरा दुख था कि सिद्धार्थ उन्हें बिना बताए, चुपचाप रात के अंधेरे में चले गए। उनका मानना था कि यदि सिद्धार्थ उनसे आज्ञा मांगते, तो वे कभी उनके मार्ग की बाधा नहीं बनतीं। पति के जाने के बाद यशोधरा ने राजसी ठाट-बाट, आभूषण और रेशमी वस्त्रों का पूरी तरह त्याग कर दिया। उन्होंने महल के भीतर ही एक तपस्विनी की तरह जीवन जीना शुरू किया:
वह केवल एक वक्त सादा भोजन करती थीं।
उन्होंने फर्श पर चटाई बिछाकर सोना शुरू कर दिया।
जब उन्हें पता चला कि सिद्धार्थ पीले वस्त्र पहनते हैं और मुंडन करा चुके हैं, तो उन्होंने भी महल में रहते हुए वही जीवनशैली अपना ली।
कपिलवस्तु वापसी: जब बुद्ध और यशोधरा की दोबारा हुई मुलाकात
ज्ञान प्राप्ति के करीब 12 वर्ष बाद, जब गौतम बुद्ध वापस अपनी नगरी कपिलवस्तु लौटे, तो पूरा राजपरिवार उनके स्वागत के लिए उमड़ पड़ा। लेकिन यशोधरा अपने कक्ष से बाहर नहीं आईं। उन्होंने कहा, "यदि मुझमें सच्चा प्रेम और पवित्रता है, तो स्वामी स्वयं मुझसे मिलने यहां आएंगे।"
बुद्ध यशोधरा की मनःस्थिति को समझते थे। वे अपने शिष्यों आनंद और सारिपुत्र के साथ यशोधरा के कक्ष में पहुंचे। बुद्ध को भिक्षु के रूप में देखकर यशोधरा अपने आंसू रोक नहीं पाईं और उनके चरणों में गिरकर रोने लगीं। बुद्ध ने बड़ी शालीनता से उन्हें संभाला और उनके त्याग की सराहना की। इसके बाद, यशोधरा ने अपने पुत्र राहुल को बुद्ध को सौंप दिया और वह स्वयं भी बुद्ध के संघ में शामिल होकर पहली 'भिक्षुणी' (Bhikkhuni) बनीं और अंततः अर्हत पद प्राप्त किया।
28 Oct 2025