रायपुर: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में आर्थिक स्वावलंबन, महिला सशक्तिकरण और जल संरक्षण को लेकर एक बेहद अनूठा और सफल प्रयोग सामने आ रहा है। धमतरी जिले में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और 'जल निधि परियोजना' के बेहतरीन तालमेल ने पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले ग्रामीणों के लिए अतिरिक्त आय के नए द्वार खोल दिए हैं। मनरेगा के तहत खोदे गए तालाबों (डबरी) को महज जल संचय तक सीमित न रखकर, उन्हें वैज्ञानिक मत्स्य पालन से जोड़ा गया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव आ रहा है।
इसी जमीनी हकीकत और इसकी भविष्य की संभावनाओं को परखने के लिए धमतरी कलेक्टर ने नगरी विकासखंड के सुदूर ग्राम बोथापारा और चनागांव का सघन दौरा किया। उन्होंने सीधे खेतों की मेढ़ पर पहुंचकर महिला मत्स्य पालकों और प्रगतिशील किसानों से संवाद किया। अधिकारियों ने बताया कि महज 33 हजार रुपये की लागत से वैज्ञानिक देखरेख में लगभग 6 महीने में 20 \times 20 \times 3 \text{ मीटर} आकार की आजीविका डबरी का निर्माण किया जा सकता है, जो लागत की तुलना में दोगुनी आय देने में सक्षम है। इस मॉडल को व्यावसायिक रूप से मजबूत बनाने के लिए प्रशासन ने 'एबिस कंपनी' के साथ हाथ मिलाया है, जो सीएसआर (CSR) के तहत मछली दाना (फीड) की खरीदी पर 25 प्रतिशत की विशेष छूट दे रही है।
निरीक्षण के दौरान महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनीं ग्राम बोथापारा की सावित्री दर्रो ने बताया कि वे अपने खेत की दो डबरियों में कतला, रोहू और मृगल मछलियों का पालन कर रही हैं। उनके बेटे ओमप्रकाश को आधुनिक मत्स्य पालन तकनीकों की एडवांस ट्रेनिंग के लिए अगले महीने पुरी (ओडिशा) भेजा जा रहा है। वहीं, चनागांव के किसान नारायण सिंह नेताम ने डबरी के साथ आम की बागवानी (इंटीग्रेटेड फार्मिंग) अपनाकर बंपर मुनाफा कमाया है। वर्तमान में धमतरी के 16 गांवों में चल रहे इस सफल मॉडल का विस्तार अब जिला प्रशासन द्वारा अगले चरण में 50 गांवों तक करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है।